रायपुर, 6 अक्टूबर 2026

सेवा संकल्प अभियान 2026 के बीच छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की ग्रामीण महिलाएं हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, समूह का सहयोग और आर्थिक सहायता मिलने से उनके लिए स्वरोजगार के नए रास्ते खुले हैं।

लखनपुर विकासखंड के ग्राम लटोरी की 20 महिलाएं हस्तशिल्प को आजीविका का आधार बना रही हैं, वहीं बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की श्रीमती सूरजपति ने समूह से मिले 60 हजार रुपये के ऋण को ऑटो रिक्शा और किराना व्यवसाय में लगाकर ‘लखपति दीदी’ की पहचान हासिल की है।

इन दोनों कहानियों में रास्ते अलग हैं, लेकिन मंजिल एक है—आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ जीवन।

हुनर को मिला प्रशिक्षण, हाथों को मिला रोजगार

लखनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत लटोरी की महामाया और रेखा स्व-सहायता समूह से जुड़ी 20 महिलाओं ने हस्तशिल्प को अपनी आजीविका से जोड़ा है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत इन महिलाओं को हस्तशिल्प बोर्ड के माध्यम से विशेष प्रशिक्षण दिया गया।

प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने खस से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार करना शुरू किया। उनके हाथों से कलात्मक डलिया, टोकरी, सजावटी गुलदस्ते, पूजा की ट्रे और फ्रूट बास्केट जैसे कई उत्पाद तैयार हो रहे हैं।

इन उत्पादों की स्थानीय बाजार में मांग बढ़ने से महिलाओं को अपने हुनर को रोजगार में बदलने का अवसर मिला है। अब उनके हाथों से तैयार उत्पाद घर की चौखट से निकलकर बाजार तक पहुंच रहे हैं और परिवार की आय में योगदान दे रहे हैं।

‘पहले रोजगार नहीं था, अब अपना काम है’

रेखा महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य श्रीमती कौशल्या राजवाड़े के लिए बिहान से जुड़ने के बाद आया बदलाव खास मायने रखता है। उनके अनुसार पहले उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था। बिहान से जुड़ने और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण मिलने के बाद उन्हें अपना काम और आय अर्जित करने का अवसर मिला।

कौशल्या और समूह की अन्य महिलाएं अब केवल उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। वे अपने कारोबार को आगे बढ़ाकर अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का सपना देख रही हैं।

स्व-सहायता समूह ने उन्हें आर्थिक गतिविधि से जोड़ने के साथ बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का आत्मविश्वास भी दिया है।

सूरजपति ने 60 हजार के ऋण को बनाया आत्मनिर्भरता की पूंजी

बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की श्रीमती सूरजपति की कहानी आर्थिक सहयोग को मेहनत के साथ जोड़कर सफलता हासिल करने का उदाहरण है। वर्ष 2020 में बिहान के स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें मार्गदर्शन के साथ आर्थिक सहयोग का रास्ता मिला।

उन्होंने समूह से 60 हजार रुपये का ऋण लिया और इसे घरेलू खर्च में इस्तेमाल करने के बजाय अपनी आजीविका के लिए पूंजी बनाया। सूरजपति ने ऑटो रिक्शा संचालन शुरू किया और इसके साथ ही किराना दुकान भी स्थापित की।

दो अलग-अलग आजीविका गतिविधियों को अपनाने से उनके परिवार के लिए आय के दो स्रोत तैयार हुए। लगातार मेहनत के बाद दोनों व्यवसाय उनकी आर्थिक मजबूती का आधार बन गए।

500 रुपये प्रतिदिन की आय से बनीं ‘लखपति दीदी’

आज सूरजपति को किराना दुकान से करीब 200 रुपये प्रतिदिन और ऑटो रिक्शा से करीब 300 रुपये प्रतिदिन की आय हो रही है। दोनों व्यवसायों से उनकी कुल दैनिक आय लगभग 500 रुपये है और वार्षिक आय करीब 1.80 लाख रुपये तक पहुंच गई है।

आर्थिक तंगी से जूझने वाली सूरजपति अब ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। यह उपलब्धि उनके लिए केवल आय का आंकड़ा नहीं, बल्कि परिवार के आर्थिक निर्णयों में बढ़ती भागीदारी और आत्मविश्वास का प्रतीक है।

हस्तशिल्प से ऑटो-किराना तक, मंजिल एक—आत्मनिर्भरता

लटोरी की 20 महिलाओं और सूरजपति की आजीविका के रास्ते भले ही अलग हैं, लेकिन दोनों की मंजिल आर्थिक आत्मनिर्भरता है।

लटोरी की महिलाओं ने प्रशिक्षण और स्थानीय संसाधनों के जरिए हस्तशिल्प को रोजगार से जोड़ा। वहीं सूरजपति ने समूह से मिले ऋण को पूंजी बनाकर ऑटो रिक्शा और किराना दुकान के रूप में आय के दो साधन विकसित किए।

इन कहानियों में बिहान की भूमिका केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। संगठन, प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग ने महिलाओं को अपनी क्षमता पहचानने और उसे आजीविका में बदलने का अवसर दिया है।

महिलाओं की कमाई से मजबूत हो रहा परिवार

जब कोई महिला स्वयं आय अर्जित करती है तो उसका प्रभाव केवल उसकी आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और बच्चों के भविष्य, घरेलू जरूरतों तथा आर्थिक फैसलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है।

लटोरी की महिलाओं के लिए हस्तशिल्प आय का नया माध्यम बना है, जबकि सूरजपति के लिए ऑटो और किराना व्यवसाय आर्थिक स्थिरता का आधार बन गए हैं।

बिहान: समूह से स्वरोजगार और स्वरोजगार से सम्मान तक

स्व-सहायता समूहों की ताकत उनकी सामूहिकता में है। महिलाएं एक साथ जुड़ती हैं, बचत करती हैं, एक-दूसरे से सीखती हैं, प्रशिक्षण लेती हैं और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपनी आजीविका को आगे बढ़ाती हैं।

बिहान के माध्यम से सरगुजा की महिलाएं इसी सामूहिक शक्ति को आर्थिक आत्मनिर्भरता में बदल रही हैं। उनके हाथों में रोजगार के साथ अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी अलग पहचान बनाने का आत्मविश्वास भी आया है।

सेवा से स्वावलंबन तक लिख रही बदलाव की कहानी

सेवा संकल्प अभियान 2026 के बीच लटोरी की महिलाओं और सूरजपति की कहानी जनकल्याण से स्वावलंबन तक पहुंचते बदलाव की तस्वीर पेश करती है। एक ओर 20 महिलाओं के हाथों का हुनर आजीविका की नई संभावना बना है, तो दूसरी ओर सूरजपति ने 60 हजार रुपये के ऋण को व्यवसाय में बदलकर करीब 1.80 लाख रुपये वार्षिक आय तक का सफर तय किया है।

ये कहानियां बताती हैं कि महिला सशक्तिकरण केवल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को ऐसे अवसर उपलब्ध कराना भी है, जिनसे वे अपने हुनर और मेहनत के बल पर स्वयं की आजीविका खड़ी कर सकें।

बिहान से सरगुजा की ग्रामीण महिलाओं के जीवन में यही नई सुबह दिखाई दे रही है—समूह से साथ, प्रशिक्षण से हुनर, आर्थिक सहयोग से स्वरोजगार और मेहनत से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम।

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